भारत-नेपाल सीमा पर वन्यजीव अपराध रोकथाम को लेकर वनकर्मियों को मिला प्रशिक्षण
—— कार्यशाला में वन्यजीव अपराधों की पहचान, तस्करी के तौर-तरीकों और रोकथाम के व्यावहारिक उपायों पर हुई गहन चर्चा
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महराजगंज। सम्पादक अम्बिका दत्त चौबे/उप सम्पादक उमेश चौरसिया
भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र में वन्यजीव अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगाने और वन्यजीव तस्करी के मामलों की पहचान एवं कार्रवाई को और अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से सोहगीबरवा वन्यजीव प्रभाग मुख्यालय स्थित सोहगीबरवा वन चेतना केंद्र में ‘वन्यजीव अवयव पहचान कार्यशाला’ का आयोजन सोमवार को किया गया। कार्यशाला में वन्यजीव अपराधों की पहचान, तस्करी के तौर-तरीकों तथा संदिग्ध वन्यजीव अवयवों की पहचान के लिए अपनाई जाने वाली तकनीकों की जानकारी दी गई।
कार्यशाला का शुभारंभ निरंजन राजेंद्र सुर्वे, आईएफएस, प्रभागीय वनाधिकारी, सोहगीबरवा वन्यजीव प्रभाग, महराजगंज ने किया। उन्होंने कहा कि भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र में वन्यजीव अपराधों की रोकथाम के लिए विभिन्न प्रवर्तन एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय और वन्यजीव अपराधों की पहचान संबंधी दक्षता बेहद महत्वपूर्ण है। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को वन्यजीव संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी भी दी गई।
28 प्रतिभागियों ने लिया प्रशिक्षण
कार्यशाला में कुल 28 प्रतिभागियों ने भाग लिया। इनमें उत्तर प्रदेश वन विभाग के 20 कर्मियों के साथ सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के 2 कर्मी, महराजगंज के 4 कर्मी तथा उत्तर प्रदेश पुलिस के 2 कर्मी शामिल रहे। प्रशिक्षण का उद्देश्य सीमा क्षेत्र में वन्यजीव अपराधों से जुड़े मामलों की पहचान और कार्रवाई के लिए संबंधित विभागों की क्षमता को मजबूत करना रहा।
कार्यक्रम में प्रमुख संसाधन व्यक्तियों के रूप में मनोश सिंह तोमर, सहायक प्रबंधक एवं प्रभारी अधिकारी, डब्ल्यूसीसीबी (WCCB), उत्तर प्रदेश क्षेत्र तथा प्रशांत श्रीवास्तव, प्रधान वन संरक्षक, वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (Wildlife Crime Control Bureau), उत्तरी क्षेत्र ने प्रतिभागियों को महत्वपूर्ण जानकारी दी।
वन्यजीव तस्करी के तरीकों और अवयवों की पहचान पर जोर
कार्यशाला के दौरान भारत-नेपाल सीमा पर होने वाले वन्यजीव अपराधों की वर्तमान स्थिति और उन्हें रोकने के लिए उठाए जा रहे कदमों पर विस्तार से चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने वन्यजीव तस्करी में इस्तेमाल होने वाले विभिन्न तौर-तरीकों और संदिग्ध वन्यजीव अवयवों की पहचान से जुड़ी तकनीकी जानकारी साझा की।
प्रशिक्षण में प्रतिभागियों को जब्त किए जाने वाले वन्यजीव अवयवों की पहचान के महत्व के साथ-साथ उनके नमूने और पहचान संबंधी प्रक्रियाओं की जानकारी भी दी गई। इससे सीमा क्षेत्र में वन्यजीव अपराध से संबंधित मामलों में कार्रवाई के दौरान अधिकारियों एवं कर्मचारियों को अधिक वैज्ञानिक एवं प्रभावी तरीके से काम करने में मदद मिलेगी।
हैंड्स-ऑन प्रशिक्षण बना आकर्षण
कार्यशाला का प्रमुख आकर्षण हैंड्स-ऑन (व्यावहारिक) प्रशिक्षण सत्र रहा। इसमें प्रतिभागियों को विभिन्न वन्यजीव अवयवों के प्रत्यक्ष अवलोकन एवं पहचान का अवसर प्रदान किया गया। व्यावहारिक अभ्यास के माध्यम से प्रतिभागियों की पहचान क्षमता एवं वन्यजीव अपराधों की रोकथाम संबंधी समझ को मजबूत किया गया।
कार्यशाला के समापन अवसर पर प्रभागीय वनाधिकारी निरंजन राजेंद्र सुर्वे ने प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए। उन्होंने भविष्य में भी इसी प्रकार के क्षमता-विकास कार्यक्रम आयोजित किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि वन्यजीव अपराधों की रोकथाम के लिए संबंधित विभागों की कार्यक्षमता और आपसी समन्वय को और मजबूत किया जा सके।
कार्यशाला के सफल संचालन में वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (WTI) की टीम का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। टीम में राजेंद्र प्रताप सिंह (सीनियर फील्ड ऑफिसर एवं प्रभारी अधिकारी), पायल चौधरी (सीनियर फील्ड ऑफिसर) तथा सुनील कुमार (फील्ड असिस्टेंट) शामिल रहे।





















